क्या आपने कभी सोचा है कि नबी ﷺ का नाम सुनने के बाद अगर कोई दुरूद न पढ़े तो क्या वह माफ़ है? बहुत से लोग इस बारे में उलझन में रहते हैं। आइए क़ुरान और हदीस की रोशनी में इस हक़ीक़त को समझते हैं।
सवाल: वो कौन लोग हैं जो नबी ﷺ के ज़िक्र पर आपके नाम के साथ दुरूद न भी पढ़ें तो माफ़ हैं?
- A. क़व्वाल
- B. नातख़्वान
- C. शायर
- D. कोई नहीं
सही जवाब है: ऑप्शन D , कोई नहीं
तफ़सील (विवरण):
📜 दलील (हदीस से)
मफ़हूम-ए-हदीस:
एक रोज़ आप ﷺ जब मिंबर पर चढ़े तो पहले क़दम पर आमीन कहा, फिर दूसरे क़दम पर भी आमीन कहा और तीसरे क़दम पर भी आमीन कहा।
सहाबा (रज़ि अल्लाहु अन्हुमा) ने इसकी वजह पूछी तो आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
- पहले क़दम पर जिब्रील (अलैहिस्सलाम) ने कहा: “लानत हो उस शख़्स पर जिसने रमज़ान का महीना पा कर भी अल्लाह की बख़्शिश न पा सका।” – फिर आप ﷺ ने आमीन कहा।
- दूसरे क़दम पर जिब्रील (अलैहिस्सलाम) ने कहा: “लानत हो उस शख़्स पर जिसने आपका नाम सुना और आप पर दुरूद व सलाम न भेजा।” – फिर आप ﷺ ने आमीन कहा।
- तीसरे क़दम पर जिब्रील (अलैहिस्सलाम) ने कहा: “लानत हो उस शख़्स पर जिसने अपने माँ-बाप को बुढ़ापे में पाया और (उनकी खिदमत करके) जन्नत हासिल न कर सका।” – फिर आप ﷺ ने आमीन कहा।
📕 (इब्ने हिब्बान, 3/188)
🕌 नसीहत
- नबी ﷺ के ज़िक्र पर दुरूद न पढ़ना गुनाह और लानत का सबब है।
- सबसे छोटा और मुकम्मल दुरूद है: “सलल्लाहु अलैहि वसल्लम”।
- नबी ﷺ की अज़मत और मोहब्बत गानों या क़व्वालियों में नहीं बल्कि क़ुरआन और सुन्नत पर अमल करने में है।
- बे-सोचे समझे नातख़्वानी और क़व्वालियों में नाम लेना लेकिन दुरूद न पढ़ना मोहब्बत नहीं बल्कि ग़लती है।
🚩 सबक
- नबी ﷺ का नाम सुनते ही दुरूद शरीफ़ पढ़ना हर मुसलमान की जिम्मेदारी है।
- मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ का असली तरीका उनकी सुन्नत की पैरवी करना है।
- हमें चाहिए कि नबी ﷺ की अज़मत का लिहाज़ रखते हुए हर बार दुरूद शरीफ़ ज़रूर पढ़ें।
🤲 दुआ
- अल्लाह तआला हमें हर वक्त नबी ﷺ का ज़िक्र सुनते ही दिल से दुरूद पढ़ने की तौफ़ीक़ दे।
- हमें ग़ैर-शरई तरीक़ों से बचाए और क़ुरआन व सुन्नत पर अमल करने वाला बनाए।
- हमारा ईमान और मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ मज़बूत करे।
जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन कसीरा 🌹



