ज़िंदगी के हर मोड़ पर इंसानों के बीच राय का फ़र्क़ होना स्वाभाविक है। लेकिन जब बात ईमान और दीन की हो, तो यह सवाल उठता है कि इख़्तिलाफ़ की सूरत में सही और अंतिम फैसला किसकी बात पर होना चाहिए?
सवाल: मोमिनों में अगर किसी बात पर इख़्तिलाफ़ हो जाए तो उनमें सबसे पहले इंसाफ़ का मयार क्या होना चाहिए?
- A. कुरआन-ओ-हदीस
- B. इमामों के फ़तवे
- C. मस्लक की दलील
- D. सही जवाब का इंतज़ार
सही जवाब है: ऑप्शन A , कुरआन-ओ-हदीस
तफ़सील (विवरण):
📖 दलील (कुरआन से प्रमाण)
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“ऐ ईमान वालों! आज्ञा का पालन करो अल्लाह की और आज्ञा का पालन करो रसूल की और उन लोगों की जो तुम में हुकूमत रखते हैं। और यदि किसी मामले में तुम में विवाद हो जाए, तो उसे अल्लाह और रसूल की तरफ़ लौटाओ, यदि तुम अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हो।”
📕 सूरह अन-निसा 4:59
🌸 तफ़सीर और समझ
- इंसानों में अक़्ल, समझ और राय अलग-अलग होने की वजह से इख़्तिलाफ़ होना नैसर्गिक है।
- लेकिन जब अल्लाह और उसके रसूल ﷺ का फ़ैसला आ जाए, तो मोमिन का काम है सर झुका देना।
- सहाबा-ए-किराम (रज़ि.अ.) का भी यही तरीका था—इख़्तिलाफ़ होता, लेकिन जैसे ही कुरआन या हदीस की दलील आ जाती, फ़ौरन पीछे हट जाते।
- अफ़सोस, आज हालात उलट हैं। लोग दलील सामने आने के बावजूद अड़े रहते हैं, और समाज में फितना और तफ़रक़ा बढ़ाते हैं।
🌟 अहम नसीहत
- इख़्तिलाफ़ की सूरत में सबसे पहले किताब और सुन्नत की तरफ़ लौटना फ़र्ज़ है।
- अगर वहां से सीधी दलील न मिले तो फिर इमामों और उलमा-ए-हक़ के फ़तवों से रहनुमाई लेनी चाहिए।
- असल मक़सद होना चाहिए—अपनी और अपने मोमिन भाइयों की इस्लाह करना, न कि जिद और अड़ियलपन दिखाना।
- अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की बात आने के बाद ज़िद पर अड़े रहना, हक़ से मुँह मोड़ना है—अल्लाह ऐसी ग़लती से बचाए।
✨ निष्कर्ष
जब भी मोमिनों के बीच किसी मसले पर इख़्तिलाफ़ हो जाए, तो सबसे पहला और आख़िरी इंसाफ़ का मयार कुरआन और हदीस ही होना चाहिए। यही असल हिदायत का रास्ता है और अल्लाह की क़रीबी का जरिया भी।


