क्या आपने कभी सोचा है कि क़ुरआन के नुज़ूल (उतारने) का असल मक़सद क्या है? क्या यह सिर्फ़ सवाब के लिए है या इंसानियत की हिदायत के लिए? इस लेख में हम इसी महत्वपूर्ण सवाल का जवाब हदीस और क़ुरआन की रोशनी में जानेंगे।
सवाल: क़ुरआन के नुज़ूल का असल मक़सद क्या है?
- A. ख़ैर-ओ-बरकत
- B. हिदायत
- C. ईसाले सवाब
- D. सही जवाब का इंतज़ार
सही जवाब है: ऑप्शन B , हिदायत
तफ़सील (विवरण):
📜 दलील (क़ुरआन से)
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरआन-ए-करीम में फ़रमाता है:
❝ऐ नबी (ﷺ)! यह मुबारक किताब (क़ुरआन) है जिसे हमने आपकी तरफ़ इस लिए नाज़िल किया ताकि लोग इसकी आयतों पर ग़ौर करें और अक़्लमंद इससे नसीहत हासिल करें।❞
📕 सूरह साद: 38:29
🕌 असल हकीकत
क़ुरआन का असल मक़सद इंसानियत को हिदायत देना है। इसकी तिलावत का सवाब हमारे लिए बोनस था, लेकिन हमने बोनस के लालच में इससे हिदायत हासिल करना छोड़ दिया और जहालत हम पर तारी हो गई।
मिसाल के तौर पर, हमारी मुसलमान बहनें सवाब के लिए क़ुरआन अरबी में पढ़ती रहती हैं और पढ़ते हुए सूरह निसा की आयत 3 आती है:
“जहां अल्लाह तआला फ़रमाता है: ऐ मुसलमान मर्द आदमियों! तुम 2,3,4 औरतों से निकाह कर सकते हो।”
लेकिन जब असल ज़िन्दगी में वही मामला आता है तो लोग उसपर अमल नहीं करते।
सब्हानअल्लाह!
हमने अल्लाह की नाज़िल की हुई हिदायत को सिर्फ़ सवाब के लिए पढ़ा, लेकिन मायने और मफ़हूम पर ग़ौर नहीं किया।
🚩 नतीजा
यही वजह है कि उम्मत के कुछ शर-पसंद लोगों ने हमें मस्लकी और फ़िर्क़ावरीयत में उलझाया। क़ुरआन से हिदायत लेने की बजाय हमने इसे सिर्फ़ मुरदों पर बख़्शवाने और बिदअतें इजाद करने के काम में लगा दिया।
📝 सीख
- क़ुरआन का असल मक़सद हिदायत है।
- इसे सिर्फ़ सवाब के लिए न पढ़ें, बल्कि मायने और मफ़हूम समझ कर अमल करें।
- जितना हो सके दूसरों तक भी हिदायत पहुँचाएँ।
🤲 दुआ
♥ इंशा-अल्लाह-उल-अज़ीज़!
- अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हमें कहने-सुनने से ज़्यादा अमल की तौफ़ीक़ दे।
- हमें क़ुरआन मजीद को पढ़ने, समझने और उसपर अमल करने की तौफ़ीक़ दे।
- जब तक हमें ज़िन्दा रखे, इस्लाम और ईमान पर ज़िन्दा रखे।
- ख़त्मा हमारा ईमान पर हो।
!!! वा आख़िरु दावाना अनिल्हम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन !!!



