इंसानों में रंगत का इख़्तेलाफ किस लिए होता है?

दुनिया भर में इंसानों की रंगत, भाषा और क़बीलों में बहुत विविधता पाई जाती है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह फर्क़ क्यों है? क्या यह बड़ाई और नीचाई की वजह से है या फिर अल्लाह की किसी हिकमत की निशानी?

सवाल: इंसानों में रंगत का इख़्तेलाफ किस लिए होता है?

  • A. नस्ली तअस्सुब
  • B. ऊँच-नीच
  • C. पहचान (शिनाख़्त)
  • D. सही जवाब का इंतज़ार

सही जवाब है: ऑप्शन C , पहचान (शिनाख़्त)

तफ़सील (विवरण):

📖 दलील:

इंसानों में रंगत और क़बीलों का फर्क़ सिर्फ़ पहचान के लिए है।

अल्लाह तआला कुरआन में फरमाता है:

“ऐ लोगो! हमने तुम सबको एक मर्द और औरत से पैदा किया और तुम्हारे कुनबे और क़बीलों को बनाया ताकि तुम एक-दूसरे को पहचान सको।”
📖 [सूरह अल-हुजुरात 49:13]

और दूसरी जगह अल्लाह तआला फरमाता है:

“और उसकी निशानियों में से है आसमानों और ज़मीन की पैदाइश और तुम्हारी ज़ुबानों और रंगतों का फर्क़।”
📖 [सूरह अर-रूम 30:22]


⚠️ इंसानी ग़लती:

अफ़सोस की बात है कि आज लोग रंग और भाषा के फर्क़ को नस्ली तअस्सुब और ऊँच-नीच का ज़रिया बना बैठे हैं। जबकि इस्लाम ने हर इंसान को बराबरी का दर्जा दिया है और किसी को उसकी रंगत, ज़ुबान या नस्ल की वजह से अफ़ज़ल या कमतर नहीं ठहराया।


🌟 सीख:

  • रंग और भाषा का फर्क़ अल्लाह की निशानियों में से है।
  • हमें नस्ली तअस्सुब और ऊँच-नीच को ख़त्म करके हर इंसान को बराबर समझना चाहिए।
  • मोहब्बत और बराबरी से ही दुनिया में आलमी अमन कायम हो सकता है।

🤲 दुआ:

  • अल्लाह तआला हमें कहने-सुनने से ज़्यादा अमल की तौफ़ीक़ दे।
  • हमें इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखे।
  • और हमारा खात्मा ईमान पर करे।
    वाअख़िरु दावाना अनिल्हम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन।

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