कभी-कभी इंसान ज़िंदगी की तकलीफ़ों से इतना टूट जाता है कि उसे मौत आसान लगने लगती है। लेकिन इस्लाम इंसान को मायूसी में नहीं गिरने देता। ऐसे हालात में भी अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ने हमें उम्मीद, सब्र और दुआ का रास्ता बताया है।
सवाल: तकलीफ़ों से तंग आकर मौत की तमन्ना करना कैसा है?
- A. हाँ! कर सकते हैं
- B. सिर्फ़ जब कोई रास्ता न हो
- C. प्यारे नबी ﷺ ने मना फरमाया
- D. सही जवाब का इंतज़ार
सही जवाब है: ऑप्शन C , प्यारे नबी ﷺ ने मना फरमाया
तफ़सील (विवरण):
📜 दलील
۞ बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम ۞
हदीस: प्यारे नबी (ﷺ) ने फ़रमाया:
“तुम में से कोई शख़्स किसी तकलीफ़ की वजह से जो उसे पहुँची हो, मौत की आरज़ू न करे। और अगर (तकलीफ़ की नौयत ऐसी हो कि इसके बगैर) कोई चारा न हो तो इस तरह दुआ करे:
‘ऐ अल्लाह! तू मुझे उसी वक़्त तक ज़िंदा रख जब तक ज़िंदगी मेरे लिए बेहतर हो, और उस वक़्त मुझे मौत दे जब मौत मेरे लिए बेहतर हो।’”
📕 रियाज़-उस-सालिहीन, हदीस 40
✨ सीख क्या मिलती है?
- इस्लाम मायूसी से रोकता है।
- मौत की दुआ करना मना है।
- मुसीबत आए तो अल्लाह से भलाई माँगनी चाहिए — चाहे ज़िंदगी में हो या मौत में।
- सही दुआ वही है जो नबी ﷺ ने बताई।



