औरत अपने रब का हक़ अदा नहीं कर सकती जब तक वो किसी और का हक़ अदा न कर ले, पर किसका?

इस्लाम ने औरत को इज़्ज़त और हक़ दिए हैं, लेकिन साथ ही कुछ जिम्मेदारियाँ भी रखी हैं। खासतौर पर शादीशुदा ज़िंदगी में बीवी और शौहर के हक़ एक-दूसरे पर फर्ज़ किए गए हैं। इसी सिलसिले में एक अहम हदीस हमें यह बताती है कि औरत अपने रब का हक़ कब अदा कर सकती है।

सवाल: औरत अपने रब का हक़ अदा नहीं कर सकती जब तक वो किसी और का हक़ अदा न कर ले, पर किसका?

  • A. वालिदैन का
  • B. शौहर का
  • C. अपने भाई का
  • D. पड़ोसी का

सही जवाब है: ऑप्शन B , शौहर का

तफ़सील (विवरण):

दलील

۞ हदीस: नबी-ए-करीम (ﷺ) का फ़रमान है:
“क़सम है उस ज़ात की जिसके हाथ में मोहम्मद ﷺ की जान है! औरत अपने रब का हक़ अदा नहीं कर सकती जब तक कि अपने शौहर का हक़ अदा न कर ले।”

📕 सुनन इब्ने माजा 1853

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