मोहब्बत इंसान की फ़ितरत है, लेकिन एक मोमिन की मोहब्बत का सबसे ऊँचा दर्जा सिर्फ़ अल्लाह तआला के लिए होना चाहिए। यही असली ईमान की निशानी और असल सफलता का रास्ता है।
सवाल: मोमिनों को सबसे ज़्यादा मोहब्बत किससे होती है?
- A. अल्लाह से
- B. अम्बिया (अलैहिस्सलाम) से
- C. वलीअल्लाहो से
- D. सही जवाब का इंतज़ार
सही जवाब है: ऑप्शन A , अल्लाह से
तफ़सील (विवरण):
दलील (क़ुरआन से)
۞ अल-कुरआन: बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम!
“और ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अल्लाह के सिवा और शरीक बना रखे हैं जिनसे वैसी मोहब्बत रखते हैं जैसी कि अल्लाह से रखनी चाहिए। और ईमान वालों को तो अल्लाह ही से ज़्यादा मोहब्बत होती है। और काश! ज़ालिम लोग वो (हक़ीक़त) अभी देख लेते जो (क़यामत के दिन) अज़ाब के वक्त देखेंगे कि सब ताक़त सिर्फ़ अल्लाह ही के लिए है और अल्लाह सख़्त अज़ाब देने वाला है।”
📕 सूरह अल-बक़रा 2:165
मोहब्बत का असली तरतीब
यह समझना ज़रूरी है कि मोहब्बत के अपने दर्जे और दायरे होते हैं:
- सबसे अफ़ज़ल मोहब्बत सिर्फ़ अल्लाह से होगी।
- उसके बाद अल्लाह के रसूल, नबी-ए-करीम ﷺ से।
- फिर सहाबा किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) से।
- फिर बुजुर्गाने-दीन और नेक बंदों से।
अगर इस तरतीब को बदल दिया जाए तो यह ग़ुलू (हद से बढ़ जाना) है, जो आगे चलकर शिर्क तक ले जाता है।
नसीहत
हमें चाहिए कि हम अपनी मोहब्बतों को अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की तय की हुई हदों में रखें। अल्लाह के अलावा किसी और से मोहब्बत इतनी न हो कि वह अल्लाह की मोहब्बत से ऊपर चली जाए। यही पाक़ीज़ा तालीमात हैं।
