ईद-उल-अज़हा की क़ुरबानी सिर्फ़ एक इबादत नहीं बल्कि इंसानियत और तक़वा का पैग़ाम भी है। सवाल ये उठता है कि क़ुरबानी का गोश्त हमें क्या करना चाहिए?
सवाल: क़ुरबानी का गोश्त क्या करें?
- A. सिर्फ़ ख़ुद खाए
- B. बेच दे
- C. खाए और खिलाए
- D. जवाब का इंतज़ार
सही जवाब है: ऑप्शन C , खाए और खिलाए
तफ़सील (विवरण):
📜 दलील
क़ुरबानी का गोश्त इंसान खुद भी खा सकता है, दूसरों को भी खिला सकता है और बचाकर भी रख सकता है।
हदीस से सबूत:
सुलेमान बिन बुरैदा अपने वालिद से रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“मैं पहले तुम्हें क़ुरबानी का गोश्त 3 दिन से ज़्यादा खाने को मना करता था, ताकि क़ुरबानी करने की ताक़त रखने वाले उन्हें भी दें जो क़ुरबानी की हैसियत नहीं रखते। लेकिन अब जब चाहो खाओ, दूसरों को खिलाओ और उसमें से बचाकर भी रखो।”
📕 जामिअ अत-तिर्मिज़ी, हदीस नं. 1510
✦ वज़ाहत
- शुरू में सिर्फ़ 3 दिन तक क़ुरबानी का गोश्त खाने की इजाज़त थी।
- बाद में यह पाबंदी हटा दी गई।
- अब मुसलमान चाहें तो गोश्त खा सकते हैं, दोस्तों व ग़रीबों को खिला सकते हैं और बचाकर भी रख सकते हैं।
🕌 निष्कर्ष
क़ुरबानी का गोश्त अल्लाह की रहमत है। इसे सिर्फ़ खुद तक सीमित न रखें बल्कि दूसरों तक भी पहुंचाएं ताकि ईद-उल-अज़हा की खुशियां हर घर में बंटें।


