इस्लामी इतिहास में ग़ज़वा-ए-बद्र एक ऐसा मुक़द्दस मौक़ा है, जहाँ मुसलमानों ने अल्लाह की मदद से एक बड़ी जीत हासिल की। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक ऐसे सहाबी भी थे जो इस जंग में शामिल नहीं हो सके, फिर भी उन्हें बद्र में शामिल होने वालों के बराबर सवाब मिला? आइए जानते हैं उनके बारे में।
सवाल: वो कौनसे सहाबी थे जो ग़ज़वा-ए-बद्र में शामिल नहीं हुए फिर भी उन्हें सवाब मिला?
- A. अबू बकर सिद्दीक़ (रज़ि.)
- B. उस्मान (रज़ि.)
- C. अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि.)
- D. हसन (रज़ि.)
सही जवाब है: ऑप्शन B , उस्मान (रज़ि.)
तफ़सील (विवरण):
📜 दलील:
۞ बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम ۞
हज़रत इब्न उमर (रज़ि.) से रिवायत है:
हज़रत उस्मान (रज़ि.) ग़ज़वा-ए-बद्र में शामिल नहीं हो सके क्योंकि उनकी बीवी (जो रसूलुल्लाह ﷺ की बेटी थीं) सख़्त बीमार थीं।
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
“तुम्हें भी उतना ही सवाब मिलेगा जितना बद्र में शामिल होने वालों को, और उतना ही हिस्सा भी मिलेगा।”
📖 सहीह बुख़ारी, जिल्द 4, हदीस 3130
🌸 सीख:
अल्लाह तआला के यहाँ नीयत और सच्चाई का बहुत बड़ा दर्जा है।
अगर इंसान किसी नेक काम की सच्ची नीयत रखे, मगर मजबूरी से शामिल न हो पाए, तो अल्लाह उसके दिल की नीयत के अनुसार उसे पूरा सवाब अता करता है।
हज़रत उस्मान (रज़ि.) इसकी बेहतरीन मिसाल हैं।



