कभी सोचा है कि इस्लाम में ऐसा कौन-सा नेक अमल है जो नमाज़, रोज़ा और ज़कात जैसे अज़ीम इबादतों से भी ऊँचा दर्जा रखता है? रसूलअल्लाह ﷺ ने खुद इस अमल की अहमियत बताई है — जो न सिर्फ समाज में मोहब्बत लाता है, बल्कि अल्लाह की नज़र में बेपनाह सवाब का हकदार बनाता है।
सवाल: वो कौन-सा अमल है जो दर्जे में नमाज़, रोज़े और ज़कात से भी बढ़कर है?
- A. नफ़्ल नमाज़ों की कसरत
- B. सदक़ा देना
- C. झगड़ने वालों में सुलह कराना
- D. सही जवाब का इंतज़ार
सही जवाब है: ऑप्शन C , झगड़ने वालों में सुलह कराना
तफ़सील (विवरण):
📖 दलील (हदीस):
हज़रत अबू दरदा (रज़ि अल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलअल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“क्या मैं तुम्हें वह अमल न बताऊँ जो दर्जे में रोज़े, नमाज़ और ज़कात से बढ़कर है?”
लोगों ने कहा, “ज़रूर बताइए।”
तो रसूलअल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“झगड़ने वालों में सुलह कराना।”
और फिर आगे फ़रमाया कि “उनमें फसाद कराना (लोगों को लड़ाना) सब नेक अमल को बर्बाद कर देता है।”
📕 सुन्नन अबू दाऊद, जिल्द 3, हदीस: 1487 — सहीह
💡 सीख :
यह हदीस हमें सिखाती है कि लोगों के बीच सुलह कराना सिर्फ एक सामाजिक काम नहीं बल्कि एक इबादत है — जो अल्लाह के नज़दीक बहुत ऊँचा दर्जा रखती है। जबकि झगड़े और फसाद फैलाना एक ऐसा गुनाह है जो इंसान के सारे नेक अमल को मिटा देता है।



