यौमे अर्फ़ा (9 ज़िल-हिज्जा) के रोज़े की फ़ज़ीलत क्या है?

हज और ज़िल-हिज्जा के दिनों की इबादतें बेशुमार फ़ज़ीलत रखती हैं। इन दिनों में सबसे अहम दिन है यौमे अर्फ़ा (9 ज़िल-हिज्जा)। सवाल यह है कि इस दिन का रोज़ा रखने का क्या सवाब है?

सवाल: यौमे अर्फ़ा (9 ज़िल-हिज्जा) के रोज़े की फ़ज़ीलत क्या है?

  • A. उम्र भर की मग़फ़िरत
  • B. साल भर की मग़फ़िरत
  • C. 2 साल की मग़फ़िरत
  • D. जवाब का इंतज़ार

सही जवाब है: ऑप्शन C , 2 साल की मग़फ़िरत

तफ़सील (विवरण):

📜 दलील

यौमे अर्फ़ा (9 ज़िल-हिज्जा) का रोज़ा 2 साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा है। इसका मतलब है बीते हुए एक साल और आने वाले एक साल के गुनाह माफ़ हो जाते हैं।

हदीस से सबूत:
अबू क़तादा (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ से यौमे अर्फ़ा के रोज़े के बारे में पूछा गया तो आपने फ़रमाया:

“यह रोज़ा गुज़रे हुए साल और आने वाले साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा है।”

📕 सहीह मुस्लिम, किताब-उस-स्याम, हदीस नं. 367


✦ वज़ाहत

  • यौमे अर्फ़ा की तारीख़: 9 ज़िल-हिज्जा।
  • यह दिन हज करने वालों के लिए अरफ़ात में ठहरने का दिन है।
  • इस रोज़े की फ़ज़ीलत सिर्फ़ उन लोगों के लिए है जो हज पर नहीं गए।
  • हाजियों के लिए यह रोज़ा नहीं है।

🕌 निष्कर्ष

  • यौमे अर्फ़ा का रोज़ा 2 साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा है।
  • इस रोज़े को न छोड़ें (अगर आप हज पर नहीं गए हैं)।
  • यह इस्लाम की बड़ी रहमत और बरकत वाला रोज़ा है।

🤲 दुआ

अल्लाह तआला हमें यौमे अर्फ़ा के रोज़े की अहमियत समझने और उसकी बरकतों से मालामाल होने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।

आमीन 🌹

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