क़ुरआन में कई क़ौमों का ज़िक्र आता है जो अपनी नाफ़रमानी की वजह से हलाक कर दी गईं।
ऐसी ही एक क़ौम थी — असहाब-उल-हिज्र जिन्होंने पहाड़ों को तराशकर घर बनाए, लेकिन अल्लाह के हुक्म को ठुकरा दिया।
सवाल: असहाब-उल-हिज्र कौन थे?
- A. कौ़म-ए-आद
- B. कौ़म-ए-समूद
- C. कौ़म-ए-लूत
- D. कौ़म-ए-नूह
सही जवाब है: ऑप्शन B , कौ़म-ए-समूद
तफ़सील (विवरण):
📜 दलील:
۞ बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम ۞
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“हिज्र वालों ने रसूलों को झुठलाया।
हमने अपनी निशानियों को उन्हें दिखाया, मगर वो उनसे मुँह फेरते रहे।
वो पहाड़ों को तराशकर सुरक्षित मकान बनाते थे।
फिर उन्हें एक तेज़ आवाज़ ने आ लिया,
और वो अपने घरों में औंधे मुँह पड़े रह गए।”
📖 सूरह अल-हिज्र (15): 80–84
🏔️ तफ़सीर (व्याख्या):
कौ़म-ए-समूद, नबी सालेह (अलैहिस्सलाम) की क़ौम थी।
ये लोग वाडी-ए-हिज्र में रहते थे, जो आज के मदाइन-सालेह (सऊदी अरब) के इलाके में स्थित है।
इन लोगों ने अल्लाह के नबी सालेह (अलैहिस्सलाम) की बात मानने से इंकार किया और
ऊँटनी को क़त्ल कर दिया — जो अल्लाह की तरफ़ से एक निशानी थी।
उनकी सरकशी और कुफ़्र की वजह से अल्लाह ने उन्हें एक ज़ोरदार आवाज़ के ज़रिए हलाक कर दिया।
📖 सूरह अल-फ़ज्र (89): 9
📖 सूरह अल-ह़ाक़्क़ा (69): 5
⚠️ सबक़:
असहाब-उल-हिज्र का वाक़या हमें ये सिखाता है कि
तक़ब्बुर (घमंड) और अल्लाह के नबियों की नाफ़रमानी इंसान को तबाही की तरफ़ ले जाती है,
चाहे वो कितने ही ताक़तवर क्यों न हों।



